Saturday, February 6, 2010

स्वर्ग, अमरत्व एवं मोक्ष

अमरत्व एवं मोक्ष सतत चिंतन एवं अभ्यास से प्राप्त होने वाला एक भाव है । भय की निवृत्ति ही अमरत्व है तथा इच्छा की निवृत्ति ही मोक्ष है। अमरत्व एवं मोक्ष को प्राप्त करने के लिए इस शरीर का समाप्त होना आवश्यक नहीं । अपितु, इसे इस शरीर में ही महसूस किया जा सकता है और अक्षय आनंद में मग्न हुआ जा सकता है। निर्भय, निर्लोभ व सर्वान्तर द्रष्टा (अर्थात "वसुधैव शरीरकं" का साधक ) विश्वात्मा से तारतम्य स्थापित कर चुका होता है और सत्य स्वरुप हो जाता है । इसलिए , उसको देहावसान के उपरान्त भी कहीं जाने की आवश्यकता नहीं होती। वह इस शरीर में ही मुक्त हो चुका होता है। वस्तुत:, वही अपनी दिव्य इच्छा शक्ति या कौतुक से संसार की व्यवस्थाएं चलाता है और इस दृष्टि से स्वर्ग भोगता है । वह निर्भय हो चुका होता है , अतएव, अमर होता है । उसकी कोई इच्छा नहीं होती, अतएव, इस जीवन में ही मोक्ष (जो इच्छा से मुक्त हो) पद प्राप्त कर लेता है। देहावसान के बाद जीव कहाँ जाता है , इसका क्या होता है , उसे इन प्रश्नों के भी झमेले में पड़ने की आवश्यकता नहीं।

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