मंगलवार, 4 अक्तूबर 2011

रुद्राष्टाध्यायी, श्रीमद्भागवत व भारतीय संविधान

ब्रह्म के सर्वव्यापकता का चित्रण जिस प्रकार रुद्राष्टाध्यायी के नमकाध्याय में हुआ है वह मुझे जितना सुरुचिपूर्ण और बोधगम्य लगा वैसा अन्यत्र नहीं दिखा. इसे पढने से श्रीमद्भागवत में सर्वान्तर ब्रह्म को निरूपित करने वाले वाक्य, विशेषतया गजेन्द्र मोक्ष का दूसरा श्लोक "यस्मिन्निदं यतश्चेदं येनेदं या इदं स्वयं..." और अधिक स्पष्ट होने लगे.
भारतीय संविधान की मूल भावना प्रजातंत्र व समाजवाद अर्थात "जनता के द्वारा, जनता के लिए, जनता का राज्य" के सन्दर्भ में भी मैं कहने लगा - "सबमें, सबसे, सबके द्वारा, सबकी सत्ता सब स्वयं वही".

मंगलवार, 23 अगस्त 2011

विधिपुरुष का योगाभ्यास

भ्रष्टाचार विरोधी आन्दोलन विधिपुरुष की एक उपचारात्मक यौगिक क्रिया है.

रविवार, 7 अगस्त 2011

मित्रदिवस की हार्दिक शुभकामनाएं!

श्रावण मास भगवान शिव को समर्पित है जिनकी सर्वोत्तम आराधना रुद्राभिषेक के द्वारा की जाती है. "वेद: शिव: शिवो वेद:" - वेद ही शिव हैं ,शिव ही वेद हैं. शुक्ल यजुर्वेद में रुद्राष्टाध्यायी के रूप में भगवान शिव  का विशद वर्णन है. रुद्राभिषेक करते समय इसी का पाठ करते हैं. इसके  शान्त्यध्याय में  सर्वत्र मित्रता भरी दृष्टि से देखने की भावना एवं कामना अखिल विश्व का कल्याण करने वाली है- 
"ॐ दृते द्रिउंह मा मित्रस्य मा चक्षुसा सर्वाणि भूतानि समीक्षन्ताम । मित्रस्याहं चक्षुषा सर्वाणि भूतानि समीक्षे। मित्रस्य चक्षुषा समीक्षामहे ।। -( रुद्राष्टाध्यायी, शुक्ल यजुर्वेद )."
आज पाश्चात्य परंपरानुसार मित्र दिवस है. सबको मित्रदिवस की हार्दिक शुभकामनाएं!

शनिवार, 25 जून 2011

धर्म और कानून एक दूसरे के पूरक हैं

धर्म और कानून एक दूसरे के पूरक हैं। शासक समूची जनता और हर तरह के आचरण को दंड के भय से व्यवस्थित नहीं कर सकता था, इसलिए, मनीषियों ने धर्म- अधर्म, पाप- पुण्य और स्वर्ग- नरक की अवधारणा प्रस्तुत की।

शनिवार, 11 जून 2011

भ्रष्टाचार की शत प्रतिशत सफाई नहीं हो सकती

भ्रष्टाचार समाज रूपी शरीर में पेट की गन्दगी है, इसकी सफाई आवश्यक हैकिन्तु, इसे पूर्णतया साफ़ नहीं किया जा सकता- जैसे पेट को पूर्णतया मल रहित नहीं किया जा सकता

शुक्रवार, 10 जून 2011

होशियार, सावधान !

अच्छी बातें सबके लिए सम्माननीय और अनुकरणीय हैं - वे चाहे जिस किसी भी किताब या धर्म ग्रन्थ में लिखी हों। जो अभियान सबके हित में हो उसका समर्थन होना ही चाहिए, वह चाहे किसी भी व्यक्ति, संगठन या पार्टी द्वारा शुरू किया गया हो। भ्रष्टाचार और काले धन के विरुद्ध उठाई जा रही आवाज को इस आधार पर दरकिनार नहीं किया जा सकता कि उसका पहल किसी विशेष समुदाय के लोगों ने किया या वह किसी विशेष संगठन द्वारा समर्थित है।

"फूट डालो -राज करो" की नीति से हम सबको सावधान रहने की जरुरत है। क्या भ्रष्टाचार पर नियंत्रण और काले धन की देश वापसी से मुसलामानों, ईसाईयों और अन्य मतावलंबियों को फायदा नहीं होगा ? सरकार या कुछ स्वार्थी राजनेता यह कह दें कि, इस मुद्दे के पीछे आर एस एस का हाथ है तो आर एस एस को नापसंद करने वाले भाईयों को क्या इस मुद्दे से अलग हो जाना चाहिए ? अपने देश का धन विदेशों में जमा करने वाले डरपोक चोरों गद्दारों से हमारा कहना है कि हिन्दुस्तान की जनता इतनी नादान नहीं है कि उसमें ऐसे सर्वांगीण हित के अभियान में धर्म के आधार पर फूट डाली जा सके।

बृहस्पतिवार, 9 जून 2011

U.P. Annual Law Referenccer

Since few months I was additionally busy in giving a book form to my personal legal notes.

As a hobby, I do regularly read the judicial decisions on all subjects. On insistence of a publisher, I arranged my notes systematically and made it exhaustive so as to make it useful for common legal practitioners. Now it is being published in the form of an annual referencer named as "U.P. Annual Referencer 2010". It has been divided in three main parts : 1. Civil Laws 2. Criminal Laws and 3. Educational and Service Laws. The book contains each and every decision delivered by the Allahabad High Court and Supreme Court relating to Central and U.P. Laws reported in various law reporters in 2010. Base reporters are Allahabad Weekly Cases, Allahabad Criminal Cases, U.P.L.B.E.C, and Allahabad Daily Judgments. Equivalent citations of each of these reports and of AIR, SCC and all other law reports available in Allahabad, have also been given.

Today, after checking and correcting final proof, I am feeling relaxed for few hours !

Next 23 days to be devoted exclusively on The Constitution of India.

-VNT

मंगलवार, 17 मई 2011

मोक्ष

मोक्ष का तात्पर्य है - इच्छा से मुक्ति । इच्छा ही किसी जीव के जन्म-मृत्यु का कारण है, यही किसी कार्य या वस्तु के आरम्भ और अंत का भी कारण है। जो इससे मुक्त हो गया वह आद्यंत रहित हो जाता है, परम तत्त्व में लीन हो जाता है। ऐसा इस शरीर में रहते हुए हो सकता है । यदि शरीर में रहते हुए नहीं हुआ तो उसके बाद कैसे होगा?

रविवार, 8 मई 2011

विज्ञान का आध्यात्मिक अर्थ

तैत्तिरीय उपनिषद् के अनुसार, भृगु को क्रमश: ब्रह्मज्ञान की प्राप्ति हुयी। इस क्रम के सम्बन्ध में भृगु वल्ली, पंचम अनुवाक में वर्णित है- "विज्ञानं ब्रह्मेति व्यजानात। विज्ञानाद्ध्येव खल्विमानि भूतानि जायन्ते। विज्ञानेन जातानि जीवन्ति। विज्ञानं प्रत्यभिसंविशन्तीति। " अर्थात, विज्ञान ब्रह्म है ऐसा जाना। क्योंकि, सचमुच में विज्ञान से ही ये प्राणी उत्पन्न होते हैं। उत्पन्न होकर विज्ञान से ही जीवित रहते हैं। विज्ञान में ही प्रत्यावर्तित होकर समाविष्ट होते है।
यहाँ "विज्ञान" शब्द का क्या अर्थ है, यह मुझे स्पष्ट नहीं हो पा रहा है। (गीताप्रेस द्वारा प्रकाशित हरिकृष्ण दास गोयन्दका कृत व्याख्या में इसका अर्थ विज्ञान स्वरुप चेतन जीवात्मा से लगाया गया है।)

शनिवार, 7 मई 2011

निष्ठा और तर्क

तर्क की तर्कसंगत सीमा होनी चाहिए। शास्त्रों में स्थान-स्थान पर अति तर्क से बचने की संस्तुति की गयी है और विशुद्ध ज्ञान रूप परमतत्व को अतर्क्य कहा गया है। कठोपनिषद (१/२/९ ) में यमराज ने नचिकेता की प्रसंशा करते हुए कहा - नैषा तर्केण मतिरापनेया... (ऐसी मति तर्क से नहीं मिल सकती। यह तो तभी उत्पन्न होती है , जब भगवत्कृपा से किसी महापुरुष का संग प्राप्त होता है। ऐसी निष्ठा ही मनुष्य को आत्मज्ञान के लिए प्रयत्न करने में प्रवृत्त करती है। हमें तुम जैसे ही पूछने वाले जिज्ञासु मिला करें)।

शुक्रवार, 6 मई 2011

तुलसी का जवाब नहीं

विद्यार्थी जीवन में मैंने तुलसी कृत श्री रामचरित मानस एवं भगवद्गीता का अनेक बार पाठ किया था - बिना किसी शोधपरक उद्देश्य के। बाद में क़ानूनी लेखों और निर्णयों में दिए गए उद्धरणों की पुष्टि करने के क्रम में तथा प्रसंगवश अनेक अन्य शास्त्रों यथा- श्रीमद्भागवत, ब्रह्मसूत्र , वृहदारण्यक एवं अन्य एक सौ आठ उपनिषद् इत्यादि का आद्योपांत पाठ कर डाला। स्वाभाविक रूप से इस क्रम में अनेक आवेशात्मक अनुभव भी होते रहे। किन्तु श्रीमद्भागवत पढ़ते समय भी प्राय: जब किसी गूढ़ एवं वेदान्तीय कथानक में तन्मय जाता तो मुझे मानस की समानार्थी चौपाई याद पड़ती और मेरे मुख से स्फुटित हो जाता - "वाह! तुलसी का जवाब नहीं!"

सर्वं खल्विदं ब्रह्म

जो कुछ भी पढ़ता हूँ, मुझे गजेन्द्र मोक्ष के दूसरे श्लोक में समाहित दिखाई देता है- "यस्मिन्निदं यतश्चेदं येनेदं य इदं स्वयं , यो अस्मात परस्मात्च परस्तं प्रपद्ये स्वयंभुवं" = जिसमें जिससे जिसके द्वारा जिसकी सत्ता जो स्वयं वही.... ।